पश्चिम एशिया (Middle East) में गहराते युद्ध के बादलों के बीच भारत की आंतरिक राजनीति में भी सरगर्मी तेज हो गई है। PM Modi ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय स्थिति की तुलना कोविड-19 महामारी के दौर से करते हुए देश को एकजुट होने का आह्वान किया है। वहीं, विपक्ष ने सरकार की विदेश नीति पर कड़े सवाल खड़े करते हुए इसे ‘दबाव वाली रणनीति’ करार दिया है।
1. PM Modi का आह्वान: “चुनौती को चुनौती देने का वक्त”
प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच जारी सैन्य संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति के लिए वैसी ही गंभीर चुनौती है जैसी कोविड-19 महामारी थी।
* भारत का स्टैंड: पीएम ने स्पष्ट किया कि जब से संघर्ष शुरू हुआ है, भारत का रुख पारदर्शी रहा है। उन्होंने कहा, “भारत का प्रयास सभी पक्षों को जल्द से जल्द शांतिपूर्ण समाधान और संवाद की मेज पर लाने के लिए प्रोत्साहित करना है।”
* एकजुटता की शक्ति: उन्होंने देशवासियों और राजनीतिक दलों को संदेश देते हुए कहा कि जब देश की सरकार और नागरिक एक सुर में चलते हैं, तो भारत किसी भी वैश्विक संकट का सामना कर सकता है।
2. राहुल गांधी का प्रहार: “मोदी 100% ट्रंप के नियंत्रण में”
दूसरी ओर, वडोदरा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के रुख पर तीखा हमला बोला। राहुल ने सीधे तौर पर पीएम मोदी की विदेश नीति को ‘झुकी हुई’ बताया।
* अमेरिका पर चुप्पी: राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि पीएम मोदी ने अपने 25 मिनट के संबोधन में अमेरिका के हमलावर रुख के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा।
* ‘रिमोट कंट्रोल’ का आरोप: राहुल ने आरोप लगाया कि “नरेंद्र मोदी पूरी तरह से डोनाल्ड ट्रंप के नियंत्रण में हैं। भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति खो चुका है और केवल वाशिंगटन के निर्देशों का पालन कर रहा है।”
3. कूटनीतिक गलियारों में हलचल
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम मोदी द्वारा इस संकट को ‘कोविड’ जैसा बताना संकेत देता है कि आने वाले समय में भारत में ईंधन की कीमतों (Fuel Prices) और सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ सकता है। सरकार संभवतः आने वाले दिनों में कुछ कड़े आर्थिक फैसले ले सकती है, जिसके लिए वह अभी से ‘राष्ट्रीय एकजुटता’ का माहौल तैयार कर रही है।
4. युद्ध का वर्तमान परिदृश्य
बता दें कि ईरान पर अमेरिकी हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई ने खाड़ी देशों में तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है। भारत के लिए चिंता का विषय वहां रहने वाले लाखों भारतीय नागरिक और ऊर्जा सुरक्षा है।
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री देश को ‘संकटकाल’ के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे कूटनीतिक विफलता बताकर घेर रहा है। पश्चिम एशिया की यह आग अब भारत की घरेलू राजनीति को भी गरमा रही है।
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