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Harish Rana case: दर्द, संघर्ष और कानून में दर्ज हो गई एक परिवार की कहानी

Harish Rana case
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 Harish Rana case: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन निवासी हरीश राणा (Harish Rana) का मामला देशभर में संवेदनशील चर्चा का विषय बना हुआ है। ये केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे परिवार के लंबे संघर्ष, उम्मीद और अंततः कठिन निर्णय की कहानी है, जिसने समाज और न्याय व्यवस्था दोनों को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया।

हरीश राणा (Harish Rana) एक होनहार छात्र थे, जिन्होंने चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी। लेकिन 20 अगस्त 2013 को एक हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी, जब वो पीजी की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। इलाज के लिए उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ और बाद में एम्स दिल्ली सहित कई बड़े अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया जैसी गंभीर स्थिति में बताया।

समय के साथ हरीश की हालत और बिगड़ती गई और वो वेजिटेटिव स्टेट में चले गए, जहां उनका शरीर लगभग पूरी तरह निष्क्रिय हो गया। उन्हें कृत्रिम माध्यम से पोषण दिया जा रहा था और सामान्य जीवन की कोई संभावना नहीं बची थी। इसके बावजूद उनके माता-पिता, अशोक राणा और निर्मला देवी ने लगभग 10 वर्षों तक उम्मीद नहीं छोड़ी और लगातार उनकी सेवा करते रहे।

इस लंबे इलाज के दौरान परिवार पर आर्थिक बोझ भी लगातार बढ़ता गया। हर महीने करीब 70 हजार रुपये का खर्च आता था, जिसके चलते उन्हें अपना दिल्ली स्थित घर तक बेचना पड़ा और गाजियाबाद में आकर बसना पड़ा। हरीश के पिता ने अपनी नौकरी तक छोड़ दी, ताकि वो अपने बेटे की देखभाल कर सकें।

आखिरकार जब वर्षों तक कोई सुधार नहीं हुआ, तो माता-पिता ने 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट में इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए याचिका दायर की। हालांकि जुलाई 2024 में हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां इस मामले पर गहन विचार-विमर्श हुआ।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और परिवार की स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को भारी मन से हरीश राणा (Harish Rana) को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी। ये फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी दर्शाता है। अदालत की पीठ ने इस मामले को ‘दुखद’ बताते हुए अनुमति दी।

अदालत के निर्देशानुसार एम्स दिल्ली में 14 मार्च से प्रक्रिया शुरू की गई, जो आठ दिनों तक चली। अंततः 24 मार्च की शाम 4:10 बजे हरीश राणा ने अंतिम सांस ली। इसके बाद 25 मार्च को उनका अंतिम संस्कार किया गया।

हरीश राणा (Harish Rana) का मामला अब केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रहा, बल्कि ये कानून और समाज दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन गया है। आने वाले समय में जब भी इच्छामृत्यु जैसे मामलों पर चर्चा होगी, ये केस एक उदाहरण के रूप में सामने आएगा।

इस घटना के बाद परिवार पूरी तरह टूट चुका है। अपने बेटे के लिए बड़े सपने देखने वाले माता-पिता अब सिर्फ उसकी यादों के साथ रह गए हैं। 13 वर्षों तक बेटे के ठीक होने की उम्मीद में बिताए गए दिन अब एक गहरी पीड़ा बन चुके हैं, जो उनके चेहरे पर साफ झलकती है।

हरीश राणा (Harish Rana) की कहानी ये दिखाती है कि जीवन और मृत्यु के बीच का निर्णय कितना जटिल और भावनात्मक हो सकता है। ये मामला आने वाले समय में न केवल कानून की किताबों में दर्ज रहेगा, बल्कि लोगों के दिलों में भी एक संवेदनशील उदाहरण के रूप में जीवित रहेगा।

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