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ईरान में ‘सेना राज’: अयातुल्ला के हाथ से फिसली सत्ता, अब IRGC लेगा जंग के फैसले; वेंस बोले— ‘ट्रंप का सब्र टूटा तो खैर नहीं’

IRGC
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मध्य-पूर्व (Middle East) में जारी तनाव के बीच ईरान से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, ईरान की सत्ता का वास्तविक नियंत्रण अब सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई के हाथों से निकलकर उनकी सबसे शक्तिशाली सैन्य शाखा ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के पास चला गया है। ईरान की विदेश नीति से लेकर युद्ध की रणनीति तक, अब हर बड़ा फैसला आईआरजीसी (IRGC) ही ले रही है।

1. आईआरजीसी: दो लाख सैनिक और मिसाइलों का ‘रिमोट’
लगभग दो लाख कट्टर सैनिकों वाली यह सेना अब ईरान की समानांतर सरकार बन चुकी है। ईरान के पास मौजूद घातक मिसाइलों के जखीरे और अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक का पूरा नियंत्रण आईआरजीसी के पास है।

* रणनीतिक चाल: आईआरजीसी अब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) पर अपना दबदबा बनाना चाहती है।
* टोल वसूली की योजना: यह सेना चाहती है कि होर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों से ईरान को ‘टोल’ वसूलने का कानूनी हक मिले। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक तेल व्यापार और अर्थव्यवस्था पर ईरान का सीधा नियंत्रण हो जाएगा।

2. अमेरिका की ‘अल्टीमेटम’ वाली चेतावनी
ईरान में बढ़ते सैन्य प्रभुत्व के बीच अमेरिकी उप राष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने तेहरान को सख्त लहजे में चेतावनी दी है। वेंस ने स्पष्ट किया है कि ईरान के पास अब समय बहुत कम बचा है।
ईरान को जल्द से जल्द ‘पीस डील’ (शांति समझौता) कर लेनी चाहिए। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बेसब्र शख्सियत वाले व्यक्ति हैं। यदि उन्होंने देखा कि कूटनीति काम नहीं कर रही है, तो वे हमलों की तीव्रता को इस हद तक बढ़ा देंगे कि ईरान को संभलने का मौका नहीं मिलेगा।” — जे.डी. वेंस, अमेरिकी उप राष्ट्रपति

3. ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ रणनीति की वापसी
वाशिंगटन से मिल रहे संकेतों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ईरान पर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ की नीति को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी में है। वेंस के बयान से साफ है कि अमेरिका अब लंबी बातचीत के मूड में नहीं है। अगर आईआरजीसी ने होर्मुज में हस्तक्षेप करने या मिसाइल परीक्षणों को जारी रखने की हिमाकत की, तो अमेरिका सीधे सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा।

ईरान में आईआरजीसी का सत्ता पर काबिज होना दुनिया के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि यह सेना कूटनीति के बजाय सैन्य संघर्ष में अधिक विश्वास रखती है। दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन की ‘बेसब्री’ इस क्षेत्र को एक महायुद्ध की ओर धकेल सकती है। अगले कुछ हफ्ते मध्य-पूर्व की भविष्य की दिशा तय करेंगे।

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