महाराष्ट्र का जलगाँव जिला, जिसे भारत का ‘केला हब’ कहा जाता है, आज एक अभूतपूर्व संकट के मुहाने पर खड़ा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी युद्ध की लपटों ने सात समंदर पार जलगाँव के किसानों की कमर तोड़ दी है। जो केला खाड़ी देशों और यूरोप की शान बनता था, वह आज या तो बंदरगाहों पर सड़ रहा है या फिर खेतों में जानवरों को खिलाया जा रहा है।
युद्ध ने छीनी मिठास: 90% निर्यात हुआ ठप
जलगाँव भारत का दूसरा सबसे बड़ा केला उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ के प्रीमियम क्वालिटी के केले को जीआई (GI) टैग प्राप्त है, जिसकी मांग विदेशों में बहुत अधिक रहती है। सामान्य दिनों में यहाँ से रोजाना औसतन 2 से 3 हजार टन केला निर्यात होता है। लेकिन युद्ध के कारण लॉजिस्टिक्स और शिपिंग रूट बाधित होने से 90% निर्यात पूरी तरह बंद हो गया है।
बंदरगाहों पर सड़ रहा ’16 हजार टन’ केला
आंकड़े डराने वाले हैं। वर्तमान में करीब 800 कंटेनर अलग-अलग बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं। एक कंटेनर की क्षमता लगभग 20 टन होती है, जिसका अर्थ है कि 16,000 टन प्रीमियम केला खराब होने की कगार पर है। केले जैसी जल्दी खराब होने वाली फसल (Perishable crop) के लिए शिपिंग में देरी काल के समान है।
कीमतें जमीन पर: ₹1600 से गिरकर ₹400 पर आई
निर्यात रुकने का सबसे बुरा असर स्थानीय बाजार पर पड़ा है। विदेशों में न जा पाने वाला माल अब घरेलू मंडियों में डंप किया जा रहा है, जिससे सप्लाई बढ़ गई और मांग घट गई।
* दो महीने पहले: ₹1600 प्रति क्विंटल।
* आज की स्थिति: ₹400 से ₹500 प्रति क्विंटल।
लागत निकलना तो दूर, किसानों को अब माल मंडी तक ले जाने का भाड़ा भी भारी पड़ रहा है। हताशा में किसान अपना कीमती केला जानवरों को खिलाने को मजबूर हैं।
2 लाख किसानों के अस्तित्व पर संकट
जलगाँव जिले की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से केले पर निर्भर है। इस संकट ने सीधे तौर पर 2 लाख किसानों और उनसे जुड़े लाखों मजदूरों की आजीविका को प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार बंद होने और घरेलू बाजार टूटने से किसानों के सामने कर्ज चुकाने और अगली फसल की तैयारी करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
जलगाँव का ‘प्रीमियम बनाना’ अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्ध की बलि चढ़ रहा है। यदि सरकार ने जल्द ही हस्तक्षेप नहीं किया या परिवहन के वैकल्पिक रास्ते नहीं खोजे, तो इस साल जलगाँव के किसानों को भारी आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ेगा। ‘जीआई टैग’ वाले इस फल को बचाने के लिए अब विशेष आर्थिक पैकेज या निर्यात सब्सिडी की दरकार है।































