क्या हुआ महिला आरक्षण बिल का?: लोकसभा में शुक्रवार यानी 17 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 मतदान के बाद पारित नहीं हो सका। ये बिल महिला आरक्षण कानून में संशोधन और उसे परिसीमन (डीलिमिटेशन) प्रक्रिया से जोड़ने के उद्देश्य से लाया गया था। हालांकि, सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन इस विधेयक के पक्ष में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में असफल रहा। बिल के समर्थन में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया, जिसके चलते ये प्रस्ताव गिर गया।
क्या था विधेयक का उद्देश्य?
केंद्र सरकार द्वारा लाया गया ये संशोधन बिल महिला आरक्षण अधिनियम 2023 में बदलाव से जुड़ा था। इस कानून के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है, जो 16 अप्रैल 2026 से लागू भी हो चुका है। लेकिन सरकार का प्रस्ताव था कि ये आरक्षण भविष्य में होने वाले परिसीमन के आधार पर लागू किया जाए, यानी सीटों की नई संरचना तय होने के बाद ही इसका पूर्ण क्रियान्वयन हो।
विपक्ष ने क्यो किया विरोध?
विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि महिला आरक्षण को तुरंत मौजूदा 543 लोकसभा सीटों पर लागू किया जाना चाहिए, न कि परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़कर इसे टाला जाए। विपक्ष ने इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ बताते हुए आरोप लगाया कि इससे अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
सरकार का पक्ष
गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में जवाब देते हुए विपक्ष पर महिला आरक्षण का विरोध करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना है और बड़ी जनसंख्या वाले क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व को संतुलित करना जरूरी है। उन्होंने परिसीमन को संवैधानिक प्रक्रिया बताते हुए कहा कि इससे सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बिल का समर्थन करते हुए कहा कि महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी देना उनका अधिकार है और सरकार इसे सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस प्रक्रिया में किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा।
राहुल गांधी और सत्ता पक्ष में तीखी बहस
वोटिंग से पहले हुई बहस के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस विधेयक को महिला सशक्तिकरण के बजाय “चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश” बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये बिल सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है और उत्तर-दक्षिण राज्यों के बीच असमानता बढ़ा सकता है।
बहस के दौरान राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री को ‘जादूगर’ कहने पर संसद में हंगामा भी हुआ। सत्ता पक्ष के नेताओं ने इसे प्रधानमंत्री और देश का अपमान बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई और माफी की मांग की।
दक्षिणी राज्यों की चिंताएं
केरल के सांसद शशि थरूर और तमिलनाडु की सांसद कनिमोझी समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस विधेयक को परिसीमन से जोड़ने पर सवाल उठाए। उनका मानना है कि इससे दक्षिण भारतीय राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
राजनीतिक बहस और आगे की राह
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। हालांकि सरकार ने ये भी संकेत दिया है कि महिला आरक्षण लागू करने के अपने संकल्प से वो पीछे नहीं हटेगी।
लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिरने के बाद महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। जहां सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के लिए खतरा मान रहा है। यकीनन आने वाले समय में ये मुद्दा देश की राजनीति का अहम केंद्र बना रह सकता है।
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