महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक अबू आजमी की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। उनके एक बयान के बाद जहां उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया, वहीं उन्हें विधानसभा से भी निलंबित कर दिया गया। इस कार्रवाई के बाद राज्य की सियासत गरमा गई है।
अखिलेश यादव ने जताई नाराजगी, तो कई कर रहे समर्थन
अबू आजमी पर हुई इस कार्रवाई को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। वहीं, दूसरी ओर कई लोग इसे सही ठहराते नजर आ रहे हैं। अमरावती की पूर्व सांसद नवनीत राणा ने इसे उचित बताते हुए सरकार से और कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
नवनीत राणा की सरकार से नई मांग
पूर्व सांसद नवनीत राणा ने अपने बयान में कहा कि जिस तरह अबू आजमी को विधानसभा अधिवेशन से निलंबित किया गया, वो सही कदम है। इसके साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से ये भी अपील की कि संभाजीनगर में स्थित औरंगजेब की कब्र को भी हटा दिया जाए। उन्होंने कहा कि जो लोग औरंगजेब की तारीफ करते हैं और उसे अपना आदर्श मानते हैं, उन्हें ये समझना चाहिए कि महाराष्ट्र में सिर्फ छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके विचार ही मान्य होंगे। अगर किसी को औरंगजेब की कब्र इतनी प्रिय है, तो वे उसे अपने घर में सजा सकते हैं।
नवनीत राणा का लगातार हमला
इससे पहले भी नवनीत राणा ने अबू आजमी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र में सिर्फ छत्रपति शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज को राजा माना जाता है। औरंगजेब ने संभाजी महाराज पर अत्याचार किए थे और इतिहास इसे कभी नहीं भूलेगा। उन्होंने सुझाव दिया कि जो लोग इतिहास से अनजान हैं, वे ‘छावा’ फिल्म देखकर सच्चाई जान सकते हैं।
अबू आजमी पर देशद्रोह का मामला दर्ज करने की मांग
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी अबू आजमी के बयान की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि आजमी ने उस औरंगजेब की तारीफ की, जिसने छत्रपति संभाजी महाराज को 40 दिनों तक प्रताड़ित किया था। उन्होंने इसे देशद्रोह करार देते हुए अबू आजमी के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने की मांग की। शिंदे ने कहा कि ऐसे बयान न केवल गलत हैं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों का अपमान भी हैं। उन्होंने ये भी कहा कि अबू आजमी को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।
अबू आजमी के बयान ने महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल ला दिया है। जहां सपा उनके समर्थन में खड़ी है, वहीं भाजपा और अन्य दल उनके खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। इस विवाद के आगे क्या मोड़ आएगा, ये देखने वाली बात होगी, लेकिन इतना तय है कि महाराष्ट्र की राजनीति में ये मुद्दा लंबे समय तक चर्चा में बना रहेगा।
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