नासिक: महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका खुलासा नासिक में हुए ‘शालार्थ आईडी’ (Shalarth ID) घोटाले से हुआ है। मार्च 2019 से जून 2025 के बीच चले इस सुनियोजित खेल में सरकारी खजाने को लगभग 150 करोड़ रुपये का चूना लगाया गया है। नासिक रोड पुलिस स्टेशन में दर्ज इस मामले ने विभाग के शीर्ष अधिकारियों से लेकर निजी शिक्षण संस्थाओं के सांठगांठ की पोल खोल दी है।
क्या है ‘शालार्थ आईडी’ और कैसे हुआ खेल?
राज्य के निजी अनुदानित स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए ‘शालार्थ आईडी’ एक अनिवार्य डिजिटल पहचान है।
फर्जीवाड़ा: जांच में सामने आया कि नासिक संभाग (नासिक, धुले, जलगांव और नंदुरबार) में 892 कर्मचारियों की फर्जी आईडी तैयार की गई।
गायब फाइलें: चौंकाने वाली बात यह है कि शिक्षा उप-निदेशक कार्यालय के रिकॉर्ड से इन कर्मचारियों की व्यक्तिगत मान्यता (Personal Approval) से संबंधित फाइलें ही गायब कर दी गईं।
फर्जी रेफरेंस: जिन रेफरेंस नंबरों के आधार पर ये आईडी जेनरेट की गईं, वे या तो अस्तित्व में नहीं थे या किसी अन्य कार्यों के लिए आवंटित थे।
आरोपियों के घेरे में ‘बड़े नाम’
विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट के आधार पर दर्ज इस एफआईआर में किसी छोटे कर्मचारी को नहीं, बल्कि विभाग के ‘स्तंभों’ को आरोपी बनाया गया है:
तीन पूर्व शिक्षा उप-निदेशक: जो उस समय नासिक संभाग की कमान संभाल रहे थे।
जिला वेतन विभाग के अधिकारी: जिनकी नाक के नीचे करोड़ों का भुगतान होता रहा।
शिक्षण संस्थाओं के पदाधिकारी: जिन्होंने फर्जी नियुक्तियां दिखाकर सरकारी धन हड़पने में मदद की।
जांच की आंच: ऐसे खुला राज
यह मामला तब प्रकाश में आया जब नासिक संभाग के कई जिलों से फर्जी नियुक्तियों की शिकायतें पुणे स्थित शिक्षा आयुक्त कार्यालय तक पहुँचीं। जब जांच शुरू हुई, तो पता चला कि:
* कई ऐसे लोग वेतन उठा रहे थे, जिनकी नियुक्ति की प्रक्रिया कभी कानूनी रूप से पूरी ही नहीं हुई थी।
* डिजिटल पोर्टल में सेंध लगाकर पिछले दरवाजे से आईडी बनाई गई थीं।
* विभाग के अंदरूनी लॉगिन क्रेडेंशियल्स का दुरुपयोग कर इस घोटाले को अंजाम दिया गया।
भ्रष्टाचार का ‘मॉडल’ और सरकारी कार्रवाई
इस घोटाले का असर न केवल राजस्व पर पड़ा है, बल्कि उन पात्र शिक्षकों के भविष्य पर भी संकट खड़ा हो गया है जो वर्षों से अपनी वैध आईडी का इंतजार कर रहे हैं।
यह एक गंभीर आर्थिक अपराध है। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, चाहे वह कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा।” — जांच टीम का आधिकारिक रुख
मुख्य आंकड़े एक नजर में:
कुल घोटाला: ₹150 करोड़ (लगभग)
प्रभावित अवधि: मार्च 2019 से जून 2025
फर्जी आईडी संख्या: 892 (शिक्षक और कर्मचारी)
शामिल जिले: नासिक, धुले, जलगांव और नंदुरबार
‘शालार्थ आईडी’ घोटाला यह साबित करता है कि तकनीकी व्यवस्थाएं तब तक सुरक्षित नहीं हैं जब तक उन्हें चलाने वाले हाथ ईमानदार न हों। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन ‘सफेदपोश’ अपराधियों से घोटाले की रकम वसूल पाएगी और क्या सिस्टम में ऐसी खामियों को हमेशा के लिए बंद किया जाएगा?
ये भी पढ़ें: महाराष्ट्र में परिवहन क्रांति: अब ई-रिक्शा और ई-बाइक के लिए भी ‘परमिट’ अनिवार्य, सिंगल विंडो से मिलेगी राहत






























