देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने एक बेहद संवेदनशील मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग लड़की को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि महिला की प्रजनन स्वतंत्रता और उसकी इच्छा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
ये मामला 15 साल की एक नाबालिग लड़की से जुड़ा है, जो 28 हफ्तों से अधिक समय की गर्भवती थी। गर्भ अवांछित था और उसकी मानसिक तथा शारीरिक स्थिति को देखते हुए ये स्पष्ट हुआ कि गर्भावस्था को जारी रखना उसके हित में नहीं है। ऐसे में मामला Supreme Court of India तक पहुंचा, जहां विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने गर्भपात की अनुमति दे दी।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna और न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की पीठ ने की। अपने फैसले में उन्होंने कहा कि गर्भवती महिला की इच्छा अजन्मे बच्चे से अधिक महत्वपूर्ण है और किसी भी अदालत को महिला को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा करना महिला के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अनचाही गर्भावस्था का नाबालिग लड़की के जीवन पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। इससे उसके मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित नाबालिग दो बार आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है, जो इस स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
अपने निर्णय में अदालत ने Article 21 of the Indian Constitution का हवाला देते हुए कहा कि अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े फैसले लेना हर महिला का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है और इस पर कोई भी अनुचित प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, विशेषकर तब जब मामला नाबालिग और अनचाहे गर्भ से जुड़ा हो।
अंत में अदालत ने निर्देश दिया कि नाबालिग लड़की को चिकित्सकीय निगरानी में सुरक्षित रूप से गर्भपात की अनुमति दी जाए, ताकि उसकी सेहत और भविष्य दोनों की रक्षा हो सके। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वायत्तता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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