मुंबई, जो अपनी चमक और रफ्तार के लिए जाना जाता है, आजकल एक बड़े घोटाले की खबरों से गूंज रहा है। मीठी नदी डिसिल्टिंग घोटाला (Mithi River Desilting Scam) ने शहर के प्रशासन और नागरिकों को हिलाकर रख दिया है। 6 मई 2025 को मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने इस मामले में आठ से ज्यादा जगहों पर छापेमारी शुरू की। ठेकेदारों और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के अधिकारियों के दफ्तरों और घरों में चल रही यह कार्रवाई मुंबई पुलिस जांच (Mumbai Police Investigation) का हिस्सा है। इस घोटाले में 1,100 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट में गड़बड़ियों का आरोप है, और अब तक पांच ठेकेदारों, तीन बिचौलियों, दो कंपनी अधिकारियों और तीन बीएमसी अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है। आइए, इस घोटाले की परतें खोलते हैं और समझते हैं कि यह मामला कैसे सामने आया और इसका मुंबई पर क्या असर है।
मीठी नदी मुंबई के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक जल निकासी चैनल है। यह 17.8 किलोमीटर लंबी नदी विहार और पवई झीलों से निकलती है और महिम खाड़ी में अरब सागर से मिलती है। जुलाई 2005 की विनाशकारी बाढ़ के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने इस नदी को गहरा करने और साफ करने का फैसला किया ताकि भविष्य में बाढ़ से बचा जा सके। इस काम के लिए 11.84 किलोमीटर का हिस्सा बीएमसी को और बाकी छह किलोमीटर का हिस्सा मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एमएमआरडीए) को सौंपा गया।
लेकिन इस प्रोजेक्ट में पिछले दो दशकों से गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आ रही थीं। मीठी नदी डिसिल्टिंग घोटाला (Mithi River Desilting Scam) तब सुर्खियों में आया जब बीजेपी विधान परिषद सदस्य प्रसाद लाड और प्रवीण दरेकर ने अगस्त 2024 में महाराष्ट्र विधान परिषद में इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि डिसिल्टिंग और नदी सौंदर्यीकरण के लिए दिए गए ठेकों में भारी वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। इसके बाद, ईओडब्ल्यू ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाकर इसकी जांच शुरू की।
6 मई 2025 की सुबह से ही ईओडब्ल्यू की टीमें मुंबई में सक्रिय हो गईं। मुंबई पुलिस जांच (Mumbai Police Investigation) के तहत आठ से ज्यादा जगहों पर छापेमारी की गई, जिसमें ठेकेदारों और बीएमसी अधिकारियों के दफ्तर और घर शामिल थे। इस जांच में एक प्राथमिकी भी दर्ज की गई, जिसमें पांच ठेकेदारों, तीन बिचौलियों, दो कंपनी अधिकारियों और तीन बीएमसी अधिकारियों पर गलत दावों के जरिए बीएमसी को 50 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान पहुंचाने का आरोप है।
इससे पहले मार्च और अप्रैल 2025 में, ईओडब्ल्यू ने 10 ठेकेदारों से पूछताछ की थी और बीएमसी से नदी से निकाले गए मलबे की सीसीटीवी फुटेज मांगी थी। जांच में यह देखा जा रहा है कि क्या मलबा वाकई निकाला गया था, और क्या इसका वजन, वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी के जरिए दस्तावेजीकरण किया गया था, जैसा कि ठेके की शर्तों में था। इसके अलावा, बीएमसी और एमएमआरडीए के रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है ताकि ठेकों की शर्तों और उनके निष्पादन में गड़बड़ियों का पता लगाया जा सके।
मीठी नदी डिसिल्टिंग घोटाला (Mithi River Desilting Scam) में 1,100 से 1,300 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं की बात सामने आई है। जांच में अब तक 18 ठेकेदारों की पहचान की गई है, जिनमें से तीन—ऋषभ जैन, मनीष कासलीवाला और शेरसिंह राठौड़—से पहले ही पूछताछ हो चुकी है। इन ठेकेदारों पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी दस्तावेज और बिल जमा किए, जिससे बीएमसी को भारी नुकसान हुआ।
शिवसेना (यूबीटी) के विधायक अनिल परब ने भी इस घोटाले में एक और गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि बीएमसी के स्टॉर्म वॉटर ड्रेन (एसडब्ल्यूडी) विभाग ने डिसिल्टिंग के लिए 35 मीटर लंबे बूम वाली मशीनों का उपयोग अनिवार्य किया, जो केवल एक कंपनी, वैभव हाइड्रॉलिक्स, के पास उपलब्ध है। इस शर्त के कारण ठेका उसी कंपनी को मिलने की संभावना थी, जिससे बीएमसी को 90 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता था। परब ने इसे ठेके में हेराफेरी और भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण बताया।
मीठी नदी के डिसिल्टिंग प्रोजेक्ट में बीएमसी और एमएमआरडीए दोनों की अहम भूमिका है। बीएमसी को पवई से कुर्ला तक का हिस्सा और एमएमआरडीए को कुर्ला से महिम कॉजवे तक का हिस्सा साफ करने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन दोनों एजेंसियों के अलग-अलग टेंडर प्रक्रियाओं ने जांच को और जटिल बना दिया है। ईओडब्ल्यू अब इन दोनों की ओर से दिए गए ठेकों के दस्तावेजों की गहन जांच कर रही है।
मार्च 2025 में, ईओडब्ल्यू ने छह बीएमसी अधिकारियों के बयान दर्ज किए, जो टेंडर प्रक्रिया और मलबे के निपटान से सीधे जुड़े थे। इसके अलावा, 17 किलोमीटर लंबी मीठी नदी के विभिन्न हिस्सों, खासकर बांद्रा और कुर्ला, में फील्ड निरीक्षण किए गए। इन निरीक्षणों में कई गड़बड़ियां सामने आईं, जैसे कि मलबे की मात्रा और उसके निपटान में असमानताएं। बीएमसी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी थी और नदी की चौड़ाई को ध्यान में रखकर ही शर्तें बनाई गई थीं।
मीठी नदी मुंबई के लिए न केवल बाढ़ से बचाव का साधन है, बल्कि यह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का भी हिस्सा है। लेकिन इस घोटाले ने स्थानीय लोगों में गुस्सा और चिंता पैदा की है। नदी की सफाई के लिए हर साल लाखों टन गाद निकाली जाती है, लेकिन फिर भी यह प्रदूषित रहती है। अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक कचरे के कारण नदी की हालत खराब होती जा रही है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि डिसिल्टिंग प्रोजेक्ट, जो बाढ़ को रोकने के लिए शुरू किया गया था, अब भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। मुंबई पुलिस जांच (Mumbai Police Investigation) से लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इस घोटाले के दोषियों को सजा मिलेगी और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियां नहीं होंगी। लेकिन यह भी सच है कि जब तक नदी की व्यापक पारिस्थितिक बहाली नहीं होती, तब तक यह समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।
यह पहली बार नहीं है जब बीएमसी के डिसिल्टिंग प्रोजेक्ट में गड़बड़ियां सामने आई हैं। 2015 में भी एक बड़ा डिसिल्टिंग घोटाला उजागर हुआ था, जिसमें 29 ठेकेदारों पर फर्जी बिल जमा करने का आरोप लगा था। उस समय ईओडब्ल्यू ने 24 फर्मों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी और कई अधिकारियों को निलंबित किया गया था। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच शुरू की थी।
मीठी नदी डिसिल्टिंग घोटाला ईओडब्ल्यू की छठी बड़ी जांच है। इससे पहले खिचड़ी घोटाला, कोविड-19 सेंटर घोटाला, लाइफलाइन हॉस्पिटल घोटाला और बॉडी बैग घोटाला जैसे मामलों में भी जांच हो चुकी है। इन जांचों में कई गिरफ्तारियां और चार्जशीट दाखिल की गई हैं, जो दर्शाता है कि ईओडब्ल्यू भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती से काम कर रही है।
इस घोटाले के बाद बीएमसी ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। अप्रैल 2025 में, अतिरिक्त नगर आयुक्त अभिजीत बांगर ने मीठी नदी डिसिल्टिंग के दौरान सभी वजन पुलों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने और गाद निकालने का सटीक डेटा रखने का आदेश दिया। इसके अलावा, बीएमसी ने ड्रोन का उपयोग शुरू किया है ताकि डिसिल्टिंग की निगरानी बेहतर तरीके से हो सके।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम भविष्य में ऐसे घोटालों को रोक पाएंगे? मीठी नदी डिसिल्टिंग घोटाला (Mithi River Desilting Scam) ने मुंबई के बुनियादी ढांचे और प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। यह जांच न केवल दोषियों को सजा दिलाने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि मुंबई को भविष्य में बाढ़ और भ्रष्टाचार जैसे खतरों से बचाया जा सके।
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