Ayushman Bharat Scheme: स्वास्थ्य हर इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा खजाना है, और इसे सस्ता और सुलभ बनाने के लिए भारत सरकार ने 2018 में आयुष्मान भारत योजना शुरू की थी। यह योजना गरीबों को मुफ्त इलाज देने का वादा लेकर आई थी, लेकिन अब एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। 01 अप्रैल 2025 को पता चला कि देश भर के 600 से ज्यादा निजी अस्पतालों ने इस योजना से अपने हाथ खींच लिए हैं। सबसे ज्यादा असर गुजरात में दिखा, जहां 233 अस्पतालों ने योजना छोड़ दी। यह खबर नई पीढ़ी के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि यह हमें बताती है कि हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाओं में अभी भी कितने बदलाव की जरूरत है।
आयुष्मान भारत योजना, जिसे औपचारिक नाम “आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना” (Ayushman Bharat-PMJAY) से जाना जाता है, 23 सितंबर 2018 को झारखंड के रांची में शुरू हुई थी। इसका मकसद 50 करोड़ लोगों को हर साल 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज देना था। शुरू में 10.74 करोड़ गरीब परिवारों को इसमें शामिल किया गया था, जो 2011 की जनगणना के आधार पर चुने गए थे। बाद में 2022 में इसे 55 करोड़ लोगों तक बढ़ाया गया। इस साल 2024 में 37 लाख आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को जोड़ा गया और फिर 6 करोड़ बुजुर्गों को भी शामिल किया गया। ओडिशा और दिल्ली भी हाल ही में इसमें जुड़े हैं। लेकिन इतने बड़े विस्तार के बाद भी निजी अस्पतालों का बाहर होना चिंता की बात है।
निजी अस्पतालों का कहना है कि योजना में तय की गईं कम दरें और भुगतान में देरी उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। गुजरात में 233, केरल में 146 और महाराष्ट्र में 83 अस्पतालों ने योजना छोड़ दी है। कुल मिलाकर 609 अस्पताल अब तक बाहर हो चुके हैं। मिसाल के तौर पर, हरियाणा में फरवरी में सैकड़ों अस्पतालों ने सेवाएं बंद कर दीं, क्योंकि वहां 400 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान बाकी था। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में भी निजी अस्पतालों ने ऐसी ही शिकायतें कीं। कुछ राज्यों में इलाज के पैकेज सिर्फ सरकारी अस्पतालों के लिए रखे गए हैं, जिससे निजी अस्पतालों को मरीज नहीं मिलते। यह सुनकर लगता है कि “आयुष्मान भारत योजना” (Ayushman Bharat Scheme) को चलाने में अभी कई चुनौतियां हैं।
सरकार की ओर से स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने राज्यसभा में बताया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) ने भुगतान के लिए नियम बनाए हैं। राज्य के अंदर के अस्पतालों को 15 दिन में और बाहर के अस्पतालों को 30 दिन में पैसे मिलने चाहिए। लेकिन अस्पतालों का कहना है कि राज्य सरकारें समय पर फंड नहीं देतीं। हरियाणा में आयुष्मान भारत की संयुक्त CEO अंकिता अधिकारी ने हाल ही में कहा था कि फंड देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है और एक हफ्ते में हालात ठीक हो जाएंगे। फिर भी, यह सवाल उठता है कि इतने बड़े पैमाने की योजना में ऐसी दिक्कतें क्यों आ रही हैं।
इस योजना ने अब तक लाखों लोगों की मदद की है। करीब 36 करोड़ लोगों को आयुष्मान कार्ड मिल चुके हैं। गरीब परिवारों को बड़े ऑपरेशन और इलाज के लिए अस्पतालों में मुफ्त सुविधा मिली है। लेकिन निजी अस्पतालों का बाहर होना इसे कमजोर कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भुगतान की प्रक्रिया तेज नहीं हुई, तो और अस्पताल योजना से हट सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीब मरीजों को होगा, जो निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं। “निजी अस्पताल बाहर” (Private Hospitals Exit) की यह खबर हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या यह योजना अपने मकसद को पूरा कर पाएगी।
गुजरात का उदाहरण देखें तो वहां के अस्पतालों ने साफ कहा कि कम पैसा और देरी से भुगतान उनके लिए घाटे का सौदा है। केरल और महाराष्ट्र में भी यही कहानी है। यह देखकर लगता है कि योजना की शुरुआत भले ही बड़े सपनों के साथ हुई हो, लेकिन इसे जमीन पर उतारने में अभी मेहनत बाकी है। सरकार ने पैकेज दरों की समीक्षा और भुगतान को तेज करने का वादा किया है। यह कदम कितना असरदार होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।
नई पीढ़ी के लिए यह खबर इसलिए मायने रखती है, क्योंकि यह हमें अपने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत दिखाती है। आयुष्मान भारत जैसी योजना गरीबों के लिए उम्मीद की किरण है, लेकिन इसके सामने खड़ी मुश्किलें भी कम नहीं हैं। यह हमें यह भी बताता है कि बड़े सपने देखना जितना जरूरी है, उन्हें सच करना उतना ही मुश्किल होता है।
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