MHADA Konkan Board: महाराष्ट्र गृहनिर्माण व क्षेत्रविकास प्राधिकरण (म्हाडा) के लिए पिछला पांच महीना किसी चमत्कार से कम नहीं रहा। जो फ्लैट 2014 से ‘सफेद हाथी’ बनकर म्हाडा की तिजोरी पर भारी पड़ रहे थे और धूल फांक रहे थे, उन्हें बेचने में प्रशासन ने बड़ी सफलता हासिल की है। कोंकण बोर्ड के इस ‘क्लीयरेंस सेल’ मॉडल ने न केवल म्हाडा की बैलेंस शीट सुधार दी है, बल्कि उसे ₹800 करोड़ का भारी-भरकम राजस्व भी दिलाया है।
सफलता का गणित: 5 महीने, 5,376 फ्लैट्स
म्हाडा के कोंकण बोर्ड ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए पिछले पांच महीनों में 5,376 फ्लैट्स की बिक्री पूरी की है। इन घरों के बिकने से प्राप्त हुए 800 करोड़ रुपयों ने म्हाडा के लिए भविष्य के प्रोजेक्ट्स का रास्ता साफ कर दिया है।
कहां और कितने घर बने थे?
| स्थान (Place) | वर्ष (Year) | घरों की संख्या (Houses Constructed) |
|---|---|---|
| विरार (बोलिंज) | 2014 | 9,409 |
| भांडार्ली (ठाणे) | 2019-20 | 1,769 |
| घोटेघर (ठाणे) | 2019-20 | 1,659 |
क्यों नहीं बिक रहे थे घर?
मुंबई, ठाणे, पालघर और पुणे जैसे इलाकों में घरों की मांग तो बहुत थी, लेकिन म्हाडा की पिछली लॉटरी प्रक्रियाओं को वैसी प्रतिक्रिया नहीं मिल रही थी जैसी उम्मीद थी। इसके पीछे मुख्य कारण बुनियादी सुविधाओं की कमी, कनेक्टिविटी के मुद्दे और निजी बिल्डरों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा थी। वर्षों तक ये घर खाली पड़े रहे, जिससे म्हाडा की करोड़ों की पूंजी फंसी हुई थी।
जायसवाल मॉडल: निजी एजेंसी और आकर्षक छूट का जादू
इस गतिरोध को तोड़ने के लिए म्हाडा के उपाध्यक्ष और सीईओ संजीव जायसवाल ने एक नई और आक्रामक रणनीति अपनाई:
- जागरूकता अभियान: निजी विज्ञापन एजेंसियों की मदद ली गई ताकि म्हाडा के घरों की विश्वसनीयता और फायदों को जनता तक पहुँचाया जा सके।
- भारी छूट (Discounts): पुराने स्टॉक को खत्म करने के लिए म्हाडा ने कीमतों में आकर्षक छूट देने की घोषणा की, जिससे मध्यवर्गीय परिवार इन घरों की ओर आकर्षित हुए।
- लचीली प्रक्रिया: लॉटरी और कागजी कार्रवाई को पहले से अधिक सुगम बनाया गया।
अब नए प्रोजेक्ट्स की बारी
इन घरों की बिक्री से प्राप्त हुए राजस्व ने म्हाडा को नई संजीवनी दी है। अधिकारियों का कहना है कि अब फंसा हुआ पैसा वापस आने से नई इमारतों के निर्माण का काम तेजी से शुरू किया जा सकेगा। इससे न केवल मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) में किफायती घरों की किल्लत दूर होगी, बल्कि म्हाडा की साख भी एक बार फिर से स्थापित होगी।
म्हाडा की यह सफलता दिखाती है कि अगर सही मार्केटिंग और सरकारी रियायतें साथ मिल जाएं, तो ‘धूल फांक रही’ संपत्तियों को भी मुनाफे के सौदे में बदला जा सकता है।































