मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया है जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। ईरान द्वारा सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने के फैसले ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट का डर पैदा कर दिया है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों ने $100 प्रति बैरल का मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर लिया, जो वैश्विक बाजारों के लिए खतरे की घंटी है।
तेल की कीमतों में आग: 45% का उछाल
बीते 28 फरवरी से अब तक कच्चे तेल के भाव में करीब 45% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। होर्मुज जलमार्ग दुनिया के कुल तेल व्यापार के लगभग पांचवें हिस्से का मार्ग है। इसकी नाकेबंदी का सीधा अर्थ है—आपूर्ति ठप और कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गतिरोध लंबा खिंचा, तो विकसित और विकासशील दोनों देशों में महंगाई का नया रिकॉर्ड बन सकता है।
ट्रंप की ‘वॉटर मिलिट्री’ योजना को लगा झटका
तेल की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति बाधित होने से घबराए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़े सैन्य गठबंधन की कोशिश की थी। ट्रंप ने 7 प्रमुख सहयोगी देशों से होर्मुज में अपने युद्धपोत और नेवी शिप तैनात करने की मांग की थी, ताकि जहाजों को सुरक्षा प्रदान की जा सके। हालांकि, इस बार अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों से ‘ना’ सुनने को मिला है:
जापान: पीएम साने ताकाइची ने स्पष्ट किया कि जापान का संविधान ऐसे किसी विदेशी सैन्य मिशन की अनुमति नहीं देता।
जर्मनी: चांसलर मर्ज ने दो टूक कहा कि नाटो (NATO) केवल एक रक्षा गठबंधन है, न कि किसी क्षेत्र में हस्तक्षेप करने वाला संगठन।
अन्य देश: इटली, फ्रांस, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी इस मिशन का हिस्सा बनने से मना कर दिया है, जो अमेरिका की घटती वैश्विक स्वीकार्यता का संकेत है।
भारत का रुख: सतर्कता और दूरी
इस पूरे घटनाक्रम पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। मंत्रालय के अनुसार, भारत से इस संबंध में कोई आधिकारिक बात नहीं की गई है। भारत वर्तमान में ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना रहा है, क्योंकि खाड़ी देशों के साथ भारत के गहरे आर्थिक और रणनीतिक हित जुड़े हैं।
प्रमुख आंकड़े और तथ्य
विवरण स्थिति
कच्चा तेल (Crude Oil) $100 प्रति बैरल से अधिक
मूल्य वृद्धि 28 फरवरी से अब तक 45%
मुख्य मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य (ईरान द्वारा बाधित)
प्रस्ताव ठुकराने वाले देश जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया आदि
होर्मुज जलमार्ग का संकट केवल सैन्य तनाव नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक युद्ध है। अमेरिका की अपील को सहयोगियों द्वारा ठुकराना यह दर्शाता है कि दुनिया अब किसी नए युद्ध में सीधे तौर पर कूदने के बजाय अपने संवैधानिक और घरेलू हितों को प्राथमिकता दे रही है। यदि कूटनीतिक समाधान जल्द नहीं निकला, तो दुनिया को दशकों के सबसे बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।
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