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E20 Petrol के खिलाफ फिर सड़क पर उतरेंगे Tehseen Poonawalla, जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल का किया ऐलान

Tehseen Poonawalla

देश में E20 Petrol को लेकर बहस एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। E20 ईंधन के इस्तेमाल और इसके वाहनों पर संभावित असर को लेकर पहले से उठ रहे सवालों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला (Tehseen Poonawalla) ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल करने का ऐलान किया है।

तहसीन पूनावाला (Tehseen Poonawalla) का कहना है कि सरकार को E20 Petrol से जुड़े तकनीकी, आर्थिक और उपभोक्ता हितों के सवालों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उनका प्रस्तावित विरोध ऐसे समय में सामने आया है, जब देश में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति पर लगातार चर्चा हो रही है।

क्या है E20 Petrol?

E20 पेट्रोल ऐसा ईंधन है जिसमें पेट्रोल के साथ अधिकतम 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जाता है। इथेनॉल मुख्य रूप से कृषि उत्पादों से तैयार होने वाला जैव ईंधन है। सरकार लंबे समय से पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति पर काम कर रही है।

इसका एक प्रमुख उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर देश की निर्भरता कम करना, घरेलू स्तर पर उपलब्ध जैव ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और इथेनॉल उत्पादन से जुड़े किसानों तथा उद्योगों को बाजार उपलब्ध कराना है।

E20 को लेकर क्यों हो रहा विरोध?

E20 के विरोध में सबसे बड़ा सवाल पुराने और नए वाहनों की compatibility को लेकर उठाया जा रहा है। आलोचकों का तर्क है कि सभी पुराने पेट्रोल वाहन 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन के लिए समान रूप से डिजाइन नहीं किए गए हैं।

इथेनॉल की प्रकृति पेट्रोल से अलग होती है और इसका अधिक मिश्रण कुछ परिस्थितियों में ईंधन दक्षता, इंजन के प्रदर्शन और वाहन के कुछ हिस्सों पर असर डाल सकता है। हालांकि, नए वाहनों को E20 के अनुरूप तैयार करने की दिशा में ऑटोमोबाइल कंपनियां काम कर रही हैं।

यही वजह है कि विरोध करने वाले लोग सरकार से ये स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं कि पुराने वाहनों के मालिकों पर E20 नीति का आर्थिक या तकनीकी असर कितना पड़ेगा।

जंतर-मंतर पर क्या होगा?

तहसीन पूनावाला (Tehseen Poonawalla) ने E20 पेट्रोल के खिलाफ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल का ऐलान किया है। उनका कहना है कि वो इस मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में लाना चाहते हैं और सरकार से उपभोक्ताओं के हित में स्पष्ट जवाब की मांग करेंगे।

इस प्रदर्शन के जरिए खासतौर पर उन वाहन मालिकों की चिंताओं को उठाने की कोशिश की जा रही है, जिनके वाहन E20 के व्यापक इस्तेमाल से पहले बाजार में आ चुके हैं।

सरकार E20 को क्यों बढ़ावा दे रही है?

भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का उद्देश्य पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाना है। इससे कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा को कम करने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की उम्मीद की जाती है।

इसके अलावा, गन्ने और अन्य कृषि फसलों से बनने वाले इथेनॉल के लिए बाजार बढ़ने से किसानों और संबंधित उद्योगों को भी फायदा पहुंच सकता है।

सरकार की तरफ से इथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने के पीछे ऊर्जा सुरक्षा, आयात में कमी और पर्यावरणीय लक्ष्यों को प्रमुख कारणों में गिना जाता है।

E10 और E20 में क्या अंतर है?

E10 पेट्रोल में 10 प्रतिशत तक इथेनॉल मिश्रण होता है, जबकि E20 पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 20 प्रतिशत तक होती है।

इथेनॉल का प्रतिशत बढ़ने के साथ पेट्रोल की ऊर्जा सामग्री में बदलाव आता है। इसी वजह से कुछ वाहनों में माइलेज में अंतर देखने को मिल सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव वाहन के मॉडल, इंजन डिजाइन, ईंधन प्रणाली और इस्तेमाल की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

पेट्रोल पंप और वाहन मालिकों के लिए क्या मायने रखता है?

E20 के व्यापक इस्तेमाल से वाहन मालिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल उनके वाहन की E20 compatibility है। नए वाहनों को निर्माता स्तर पर E20 के अनुरूप तैयार किया जा रहा है, जबकि पुराने वाहनों को लेकर अलग-अलग मॉडल और निर्माण वर्ष के हिसाब से स्थिति अलग हो सकती है।

इसलिए वाहन मालिकों के लिए अपने वाहन के निर्माता द्वारा जारी दिशा-निर्देश और compatibility जानकारी देखना महत्वपूर्ण है। केवल वाहन पुराना या नया होने के आधार पर सभी मॉडलों पर एक जैसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

E20 विवाद में आगे क्या?

जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध के बाद E20 पेट्रोल को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस और तेज होने की संभावना है। एक तरफ सरकार इथेनॉल मिश्रण को ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता कम करने की नीति के तौर पर देख रही है, वहीं विरोध करने वाले लोग वाहन मालिकों की लागत, माइलेज और पुराने वाहनों की compatibility को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

ऐसे में आने वाले समय में इस मुद्दे पर सरकार, ऑटोमोबाइल कंपनियों, विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों के बीच चर्चा महत्वपूर्ण होगी। खासतौर पर पुराने वाहनों के मालिकों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश और तकनीकी जानकारी इस बहस का अहम हिस्सा बन सकती है।

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