बांग्लादेश और चीन के बीच तीस्ता नदी के प्रबंधन और पुनरुद्धार को लेकर सहयोग एक बार फिर चर्चा में है। बांग्लादेश की नई सरकार इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए चीन की तकनीकी और वित्तीय मदद लेने की दिशा में बढ़ रही है। इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में तीस्ता नदी का मुद्दा एक बार फिर अहम हो गया है। हालांकि, बांग्लादेश सरकार ने स्पष्ट किया है कि वो तीस्ता परियोजना को लेकर भारत के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहती।
चीन के सहयोग से तीस्ता परियोजना आगे बढ़ाने की तैयारी
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की जून 2026 में चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच तीस्ता और अन्य नदियों के जल प्रबंधन को लेकर सहयोग मजबूत करने पर सहमति बनी थी। बांग्लादेश ने चीन से जल संसाधन प्रबंधन, नदी कटाव रोकने, सिंचाई व्यवस्था सुधारने और आंतरिक जल परिवहन को बेहतर बनाने में तकनीकी सहयोग मांगा था। चीन की ओर से भी सहयोग का आश्वासन दिया गया।
तीस्ता परियोजना के लिए चीन की भागीदारी कोई बिल्कुल नई बात नहीं है। बांग्लादेश और चीन के बीच इस विषय पर पहले भी समझौते और बातचीत हो चुकी है। अब इसे व्यापक Teesta River Comprehensive Management and Restoration Project के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
तीस्ता नदी भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
तीस्ता नदी हिमालयी क्षेत्र से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी का पानी दोनों देशों के लिए कृषि, सिंचाई और स्थानीय आजीविका के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
यही वजह है कि तीस्ता के पानी के इस्तेमाल और बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच संवेदनशील विषय रहा है। नदी पर भारत में मौजूद बुनियादी ढांचे और बांग्लादेश की जल जरूरतों के बीच संतुलन बनाना दोनों देशों के लिए चुनौती रहा है।
भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता समझौता क्यों अटका?
भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से बातचीत होती रही है, लेकिन अब तक कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका है।
इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार की आपत्तियां भी महत्वपूर्ण रही हैं। राज्य सरकार का तर्क रहा है कि तीस्ता के पानी को लेकर किसी भी समझौते का असर पश्चिम बंगाल के किसानों और स्थानीय जल जरूरतों पर पड़ सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में बांग्लादेश अब तीस्ता नदी के अपने हिस्से में व्यापक जल प्रबंधन और पुनरुद्धार परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए चीन से सहयोग की संभावना तलाश रहा है।
क्या चीन की एंट्री से भारत-बांग्लादेश संबंध प्रभावित होंगे?
तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील मानी जा रही है। परियोजना का क्षेत्र भारत के पूर्वोत्तर और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के आसपास के व्यापक भूगोल से जुड़ा हुआ है। इसलिए चीन की किसी बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजना में भागीदारी को लेकर भारत में रणनीतिक चिंताएं उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, चीन ने कहा है कि उसका बांग्लादेश के साथ नदी प्रबंधन में सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है। वहीं बांग्लादेश ने भी कहा है कि तीस्ता परियोजना को भारत के साथ उसके मैत्रीपूर्ण संबंधों को नुकसान पहुंचाने का कारण नहीं बनने दिया जाएगा।
बांग्लादेश के लिए तीस्ता परियोजना क्यों जरूरी है?
बांग्लादेश के लिए तीस्ता केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। नदी में पानी के प्रवाह में बदलाव, बाढ़ और नदी कटाव जैसी समस्याएं इसके आसपास रहने वाली आबादी को प्रभावित करती हैं।
प्रस्तावित परियोजना में नदी की ड्रेजिंग, बाढ़ नियंत्रण, तटों की सुरक्षा, नदी प्रबंधन, भूमि संरक्षण और सिंचाई व्यवस्था में सुधार जैसे काम शामिल किए जाने की चर्चा है। इसका उद्देश्य बांग्लादेश में तीस्ता के जल संसाधनों का अधिक व्यवस्थित इस्तेमाल करना है।
तारिक रहमान सरकार की रणनीति क्या है?
प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार तीस्ता परियोजना को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ाने की बात कर रही है। चीन के साथ सहयोग इसी रणनीति का एक हिस्सा है।
हालांकि, बांग्लादेश के सामने एक महत्वपूर्ण संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। एक ओर उसे चीन से मिलने वाली तकनीकी और आर्थिक मदद का लाभ उठाना है, वहीं दूसरी ओर भारत के साथ व्यापार, सीमा, जल संसाधन और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में संबंध भी उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
भारत के लिए आगे की चुनौती
तीस्ता परियोजना आने वाले समय में भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मुद्दा बन सकती है। खासकर तब, जब दोनों देश अपने रिश्तों को सामान्य और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
बांग्लादेश की ओर से यह संकेत दिया गया है कि वह भारत के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहता। दूसरी ओर, चीन की बढ़ती भूमिका इस पूरे मामले में एक नया रणनीतिक आयाम जोड़ रही है। ऐसे में आने वाले समय में तीस्ता नदी केवल जल बंटवारे का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत-बांग्लादेश-चीन के बीच क्षेत्रीय कूटनीति का भी महत्वपूर्ण विषय बन सकती है।






























